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Our Father

 


In Loving Memory of Our Father

(August 2011)

आज की इस दुखद बेला में हम सब दिवंगत आत्मा श्री बलबीर सिंह जी को श्रदांजलि देने के लिए एकत्रित हुए हैंवह एक दृर इच्छा शक्ति के स्वामी, कर्मठ एवम धीर वीर कर्मयोगी थे अत: ऐसी पवित्र आत्मा को सच्ची श्रधांजलि तभी सफल होगी जब हम दृर संकल्प से उनके दिखाए मार्ग को अपनाये तथा उसे अपने जीवन का अभिन्न अंग बना लेवह एक स्पष्ट वक्ता , परोपकारी और पक्के इरादों वाले व्यक्तित्व के स्वामी थे जो यदा कदा ही इस संसार में जन्म लेते हैं | उनके जीवन काल में कुछ घटनाएँ ऐसी हैं जो अन्यों के जीवन की दिशा को सफलता सुखमय जीवन की और  अग्रसर करने वाली सिद्ध हुई हैं

स्व: वर्मा जी का जन्म लायालपुर में स्वडॉ. गोपाल दास वर्मा जी तथा माता स्व: श्रीमती विद्यावंती जी के घर प्रथम संतान के रूप में हुआजैसे जैसे आयु बड़ी यह अपने माता पिता के गुणों को अपनाने लगे | आयु के बढने के साथ साथ वर्मा जी ने अपने आदर्शवादी , अध्यात्मिकपरोपकारी एवम क्रांतिकारी सुधारवादी विचारों वाले माता पिता के सभी गुणों को विरासत के रूप में अपनाया | समय की गति के साथ इन गुणों का इनके जीवन तथा व्यक्तित्व में भरपूर विकास हुआ | पिता द्वारा रोपित आदर्शों को इन्होने जीवन पर्यंत अमूल्य खजाने की भांति संजो कर रखा |

इनका छोटी सी आयु में पाकिस्तान बनने के कराण संघर्षमय जीवन आरम्भ हुआ | एक जिम्मेदार पुत्र ने पिता के कंधे से कन्धा मिलाकर अपने छोटे भाई बहनों का उतर्दिय्तव वहन किया | माता पिता के आशीर्वाद एवम सहयोग से अपने नन्हे - नन्हे कन्धों पर यह उतर्द्यीतव बखूबी निबाहा | सबको अनुशासित रह कर उन्नति की और अग्रसर होने को प्ररित कियाविवाह  के बाद इनकी तयाग्मयी एवम रिश्तों का मान रखने वाली पत्नी ने इनके सद्कर्मों  एवम कर्तव्यों को सम्पादित करने में पूर्ण सहयोग दिया | वर्मा जी ने अपने उतर्द्यीतव एवम कार्यों को कभी भी किसी अन्य पर नहीं डाला अपितु दूसरों की जरूरतों को जान कर स्वयं आगे बड कर सहायता की |

जब नौकरी आरंभ की तो उस समय इनकी दोस्ती स्व: श्री . . वोहरा जी से हुई , वह दोस्ती जीवन पर्यंत चली, सुख दुःख में दोनों एक दुसरे को सहारा दिये पाय गये | वर्मा जी सदा दूसरों के कष्टों के प्रति सवेंदनशील रहे | उनके दर्द को दूर किये बिना आराम से बैठना उन्हें स्वीकार नहीं था | बहुत वर्ष पूर्व की घटना है  वर्मा जी के पड़ोस में एक सिन्धी महिला अपने पुत्र के साथ रहती थीं | उनका नन्हा सा पुत्र एक दिन शाम तक स्कूल से घर नहीं लोटा, जब इन्हें मालूम हुआ तो उसी वक्त यह उस बच्चे की खोज में निकल पडे , सारी रात के अथक परिश्रम के बाद बच्चा स्कूल बस में सोता हुआ मिला | उसे लेकर घर पहुंचे तो परिवार में ख़ुशी की लहर छा गयी | उसी दिन उस भद्र महिला ने वर्मा जी को अपना भाई बना लिया, जो रिश्ता जीवन पर्यंत निभा | रिश्तों को निभाने व् उनका मान रखना कोई उनसे जाने, वर्मा जी की अपनी चार बहने थीं परन्तु वह सदा कहते थे मेरी बने हैं (चार ताऊ जी की तथा एक मुहं बोली ) उनका व्यवहार सबके साथ एक सा रहा |

अपने पिता की भांति वह भी गरीबों के मसीहा थे | एक छोटी सी घटना उनकी संवेदन-शीलता को दर्शाती है | बहुत समय पूर्व वर्मा जी के दफ्तर में उनका जुनिएर था वह अक्सर दोपहर को खाना नहीं खाता था , जो वर्मा जी की पारखी नज़र से छुप सका | उससे काफी पूछ-ताछ करने के बाद सारी स्थिती सामने आई | वह क़र्ज़ से दबा था सारा वेतन क़र्ज़ में निकल जाता, जो बचता उससे परिवार कवेल एक बार ही भोजन कर पता थाउसकी समस्या को दूर करने के लिए उन्होंने उसके कर्जा लेने वालों से बात की, गारंटी ली, क़र्ज़  को किश्तों में बांटाइतना करने के उपरांत एक माह का राशन सौ रूपए अपने पास से भजे, अगले माह बैंक में छोटा सा बचत खाता खुलवाया | इन प्रयत्नों के बाद उस कर्मचारी की गृहस्थ की गाड़ी सही रफ़्तार से चल पड़ी | उसकी पत्नी और वह धन्यवाद करते नहीं थकते थे | परन्तु दूसरों की समस्याओं को सुलझाने का सिलसिला यहीं नहीं थमा | उनके लिये खून के रिश्ते अनजान में कोई भेद नहीं, सबके लिए एक समान दर्द था | अभी कुछ दिन पूर्व की घटना है, अपनी अस्वस्थता के कारण वर्मा जी अग्रसेन अस्पताल में भर्ती थे वहां एक लड़की की समस्या उनके सुनमुख आई | वह गरीब लड़की अपनी माता जी के इलाज के लिए आई थी, अस्पताल वालों ने दस हज़ार रूपए ले कर माँ को भर्ती किया, शोचनीय दशा के कारण अब उस लड़की से तीस हज़ार रूपए और मागे गए, माँ बेटी परेशान हो गए की क्या करें| जब वर्मा जी को उनके समस्या पता चली तो वह उसे सुलझाने में लग गए | डॉक्टर को विभिन्न ढंग से दलील दे कर समझाने का पर्यत्न किया और अंत में सफल हुए | लड़की को रूपए वापिस दिलवाए तथा फ्री इलाज की व्यवस्था भी करवाई | दूसरों के कष्ट देख तो वह उसे सुलझाने में लग गए | दूसरों के कष्ट दूर करने का इस हद तक सरूर था उनमें |

अपने पूरे कार्यकाल में वह एक कर्मठ, निष्ठावान, निर्भीक सैनिक की भांति कार्यरत रहे | उन्हें सरकार द्वारा पुरस्कारों से नवाज़ा गया | अत्यंत सराहनीय कार्य एवं खोज के लिए भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति द्वारा  "श्रमवीर राष्ट्रीय पुरुस्कार " से सम्मानित किया गया | उन्होंने अपने कार्यकाल में अपने दाइत्वों को कभी वरिष्ठ अधिकारीयों के भय में अथवा उनके तुष्ठी के हेतु नहीं किया | अपने कार्यों को अपना धर्म कर्तव्य मान कर निबाहा | छोटे भाई बहनों को कभी माता पिता की कमी महसूस नहीं होने दी | परिवार घर के संचालन प्रभंधन में भी सदा वह सराहनीय रहे | परिवार के किसी सदस्य पर कोई बंधन नहीं केवल अनुशसित रह कर कर्तव्य पूर्ण करने की सीख, किसी पर कोई भावनात्मक अथवा आर्थिक दवाब नहीं | पुत्र अथवा पुत्री में कोई भेदभाव नहीं, पुत्रवधुएँ पुत्री से अधिक प्रिय | इनके इस व्यवहार नीतियों के कराण सभी आज्ञाकारी सेवादार मूल्यों के धनी बने | चाहे बहुएं अथवा पुत्र, पुत्री, पोते, पोतियाँ , नाती, नातिन यह सब उनके द्वारा दी गई शिक्षा  दीक्षा संस्कारों का ही परिणाम रहा है | बाहें बहनोई सभी भाई के गुण गाते थकते नहीं |

वर्मा जी में सबको अपना बना लेने का एक अद्भुत गुण था वह जहाँ जाते अपने आस पास के लोगों को अपना बना लेते, सब उनके मित्र बन जाते | वह जहाँ जाते भाषा और भिन्न  संस्कृति की दिवार हटा कर सब को अपना बना लेते |

इनके जीवन की यह एक हलकी सी झलक है इनके जीवन के अनेकों संस्मरण हैं, यदि उन पर विचार करें तो एक ग्रन्थ लिख डालें | वर्मा जी के जीवन की अभी भी अनेको अनकही घटनाएँ हैं जो वास्तव में प्रेरणा प्रदान करनी  वाली हैं |

ऐसे महान व्यक्तिव के स्वामी के लिए हम सब मिल कर प्रभु से करबद्ध प्रार्थना करते हैं की इस पवित्र आत्मा को परम पिता परमात्मा प्रकाशमय मार्ग से मोक्ष प्रदान करें और उन्हें जीवन मरण के चक्र से मुक्त करें |

 " शांति शांति शांति "

 

                                  

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